एक और निपट गया


स्कुल से तो कई बार जल्दी भागे थे। पहले बैग दीवार के पार फेंकी, फिर खुद कूद मारी। एक बार तो छलांग मारने में पैंट भी फट गयी थी। पर आफिस से जल्दी निकलने में तो हर बार ही फटती है। पहले तो छुट्टी के लिए गिड़गिड़ाओ, और फिर कहीं ट्रेन या फ्लाइट शाम की पकड़नी हो, तो जल्दी निकलने के लिए बॉस के पैरों पर ही गिरना पड़ता है।

वैसे तो 7:00 बजे से पहले शायद ही निकलते है ऑफिस से, पर कुछ ऑप्टिमिस्टिक हो कर 6:40 की ट्रेन करा राखी थी, सो अब निकलने का समय हो चला था।  मुझे लगा किस्मत साथ दे रही है जो दो घंटे से चल रही वीडियो कॉन्फ्रेन्स भी 5:30 तक खत्म हो गयी। कॉन्फरेंस रूम से निकल कर बॉस अपनी केबिन में गयें, और मैं भी उनके पीछे वहीँ पहुँच गया। इससे पहले की मैं जाने के बारे में कहता, वो मीटिंग के पॉइंट्स ले कर शुरू हो गयें। अगले पंद्रह मिनट तक वो कुछ कुछ कहते रहे, और मैं हाँ में हाँ मिलाता रहा। जब देखा की अब और देरी की तो ट्रेन पक्की छुट जायेगी, तो बिच में टोक कर, हिम्मत से कहा -“सर…. वो, मेरी ट्रेन है अभी, मुझे निकलना होगा।”

पर बॉस तो बॉस ही होता है, उन्होंने कहा – “अच्छा हाँ, तुमने बताया तो था। पर देख लो, कहीं ट्रेन डिले या कैंसल तो नहीं हो गयी।”

मन तो किया पास की पॉवर प्लग में ऊँगली घुसेड़ दूं (किसका वो नहीं कहूँगा)। फिर भी उनकी तसल्ली के लिए चेक कर के बताया की नहीं सर, ट्रेन टाइम पर ही है। 

जैसे सीने में अचानक से कोई दर्द उठा हो, वैसे सी शक्ल बनाकर उन्होंने जाने की इज़ाज़त तो दे दी।

घड़ी में 6:00 बज चुके थे, सो मैं बस बैग उठाकर भग लिया। स्टेशन पहुँचा तो ट्रेन लग चुकी थी – हावड़ा आनंद विहार युवा एक्सप्रेस। भगवान क़सम बता रहे हैं, अब कभी इस ट्रेन से टिकट नहीं करवाएंगे। सरकार ने युवाओं की मारने के लिये ये ट्रेन निकाली थी – पूरी चेयर कार। मतलब बैठ के हावड़ा से दिल्ली जाइये, और अपना फड़वा के हाथ में ले लीजिये। पर जब ट्रेन खाली जाने लगी तो बाद में सरकार ने इसमें थर्ड ऐसी के डब्बे भी जोड़े दिए थे। मेरी टिकट भी थर्ड ऐसी की ही थी, लेकिन युवा ऐक्सप्रेस का मतलब सब चेयर कार ही समझते हैं। तो जितने लोगों को भी बताया की युवा एक्सप्रेस से जा रहे है दिल्ली, सबने यही पूछा – “चेयर कार से? बैठ कर?” और मुझे एक्सप्लेन करना पड़ा कि नहीं भइया, थर्ड ऐसी भी होता है इस ट्रेन में। पूरा दिमाग का धनिया का चटनी हो गया एक्सप्लेनेशन देते देते।

ट्रेन में अपना बर्थ खोज के बैठे। रात का खाना तो आई आर सी टी सी की इ-कैटरिंग से बुक कर दिए थे – अलीबाबा की नवाबी मटन बिर्यानी। एक समय तो लगा की ससुरा डिलीवर नहीं करेगा, लेकिन ट्रेन खुलने से बसे दो मिनट पहले बिर्यानी का पैकेट एकदम हमारे बर्थ पर दे गया। बहुत बढ़िया सर्विस है, आप भी ट्राई कीजियेगा। अब बिर्यानी का पैकेट पास में रखा हो तो खुद को रोके कैसे, फिर भी यह सोच कर कि अभी ही खा लिया तो रात में फिर भूख लग जायेगी किसी तरह एक घण्टा वेट किया। अब 7:30 बज चुके थे, बिर्यानी भी ठंडी हो रही थी, तो बस हम शुरू हो गयें। अभी आधी ही खायी थी की, टीटी साहब आ गये टिकट चेक करने। एस एम एस तो मैंने दिखा दिया, पर आई डि कार्ड तो मेरे वॉलेट में पैंट की पिछली पॉकेट में थी। हाथ जूठा होने के कारण मैंने घूम कर टीटी साहब को पैंट से वॉलेट निकालने का इशारा किया। बस क्या था, वो तो भड़क से ही गये, और बिना आई डि कार्ड देखे चले गये। साला सबके कांसेप्ट ख़राब हो गये हैं।

खैर, कुछ देर बाद आसनसोल स्टेशन आया और हमारे बगल वाली सीट पर, जो अब तक खली थी, एक परिवार चढ़ा – माता पिता और दो छोटे बच्चे। तो अब कुल मिलाकर हमारी आस पास की सीटों पर बच्चे हो गयें थे चार, जिन्होंने कुछ ही देर में एकसाथ सिंक्रोनाइज करके भेंभियाना शुरू कर दिया। खाना तो हमने खा ही लिया था, और 9:00 बज भी चुके थे, तो बस हम अपनी अप्पर बर्थ पर जाके, हेडफोन लगाके प्रकाश झा का ‘जय गंगाजल’ देखने लगे। करीब आधे घंटे बाद हमें फिर से बिर्यानी की खुशबू आयी। मन विचलित सा हुआ, और पेट भी। हमने नीचे झाँक कर देखा तो आसनसोल वाला परिवार भी बिर्यानी लाया था, ये बड़े वाले डब्बे में। खुशबू तो अलीबाबा वाली बिर्यानी से भी बेहतर आ रही थी। मन तो कर रहा था कि थोड़ा सा मांग ले, लेकिन मांगते भी तो कैसे, बिर्यानी का डब्बा खुलने से पहले तो बात भी नहीं की थी। बस किसी तरह मुँह घुमाके, पेट दबाके, नाक पर रुमाल डाल कर सो गयें।

अच्छा ये तो बताना रह ही गया कि दिल्ली क्यों जा रहे थे। शादी थी न अपने दोस्त की। पिछले पांच महीनों में ये चौथे दोस्त की शादी थी। एक और निपटने वाला था, और हम उसीके शाक्षी होने दिल्ली पहुँच रहे थे। अगली बार घर वालों को बताया की दोस्त की शादी में जा रहे है, तो हमें डर है कि कहीं हमारी शादी की बात ही न छेड़ दें,भगवान की दया से अभी तक तो ये टॉपिक दबा हुआ है।

तो सुबह 11:30 बजे आनन्द विहार टर्मिनस पर उतरे और गुप्ता के घर पहुँच गये, अपना दोस्त है, उसीके यहाँ रहने का ठीक किया था। घर पहुँच कर गुप्ता को प्यार भरी गालियाँ दी और अरोड़ा (जिसकी शादी थी) उसे फ़ोन किया। फ़ोन करने पर पता चला की आज सगाई का प्रोग्राम था उसका, दिन के समय। हमने कहा चलो, दिन के खाने का तो इंतज़ाम हो गया। फिर अरोड़ा ने बैंक्वेट हाल का एड्रेस मैसेज किया और साथ में यह भी लिखा की “तैयार होकर आना”। सही कहते हैं, लोग बदल जाते हैं। मतलब जो आदमी साला बॉक्सर चड्डी पहन कर, बिना अपने भालू से पैरों की चिंता किये, पूरा शहर घूम आता था, वह आज हमें कह रहा है कि “तैयार होकर आना”। साला कौन सा तैयार होने के बाद हम हैंडसम हो जायेंगे, देखने में तो वही जूट मिल के मज़दूर ही दिखेंगे। अपना स्टाइल तो वही है।

फिर भी, हम और गुप्ता, तैयार होकर सगाई समारोह में पहुँचे। अरोड़ा पोल्का डॉट्स टाइप सूट और लाल टाई पहन के जंच रहा था, और भाभीजी के साथ जोड़ी भी शानदार लग रही थी। खाना वाना भी बढ़िया दिख रहा था, भूख भी लगी थी, सो हम जल्दी से टूट पड़े, और पेट भर पेला।

शादी परसों दिन में थी, तो हमारे पास पुरे डेढ़ दिन थे पियक्कड़ी करने के लीये। सगाई से निकल कर हमने बाकि लोगों को जुटाना शुरू किया। दो दोस्त मुम्बई से आये थे, तो पहले उन्हें उठाया, फिर एक फरीदाबाद से पहुँचा और एक नोयडा से। फिर क्या, दारु ख़रीदी और पिके उलट गयें। इसी बीच फ़िल्म देखने का प्लान बना – दी जंगल बुक – हिंदी में। 10:45 का शो था, पी वी आर में। तो सब दारु पीके, बॉक्सर चड्डी पहन के पहुँच गयें। मन तो मेरा भी बहुत था फ़िल्म देखने का, लेकिन जैसे ही अँधेरा हुआ, ऐसी की हवा लगने लगी, मुझे तो नींद आ गयी।  फिर बीच में एक दो बार आँखें खुली, या कोई अच्छा सीन आया तो बगल से दोस्त ने उठाने की कोशीश की, वरना मैं तो ढाई घंटे सोता ही रहा। 225 रुपये की नींद हो गयी, बड़ी महंगी पड़ी।

दूसरे दिन, दिल्ली वाले तो सारे चले गये ऑफिस, और हम बहार वालों के पास कोई काम नहीं था। अरोड़ा ने होटल बुक कराया था एक दिन के लिये, तो पहले तो हम वहीँ पहुंचे। फिर फ़िल्म देखने का सोचा, तो साहरुख़ ख़ान की फैन लगी थी, उसकी हिम्मत तो नहीं कर पाये। फिर दिन भर इधर उधर घूम कर और, बोलिंग करके दिन बिताया। रात को चंडीगड़ से भी दो दोस्त पहुँचे और नोयडा से एक बचा हुआ था, वो भी आया। अच्छा नोयडा वाले का तो बताया ही नहीं, बादल, इसने भी सगाई कर ली थी वही रविवार को, जिस दिन अरोड़ा की सगाई थी। मतलब एक और निपटा। साला सगाई सब सीक्रेट में करते हैं। बता दोगे तो साला हम पहुँच थोड़े ही जायेंगे।

रात को फिर इतनी पियक्कड़ी हुयी कि होटल के बाथरूम के गेट में लगा कांच तोड़ डाला। और उमेश (चण्डीगढ़) ने तो साला जो सब किया, उसे मैं बयां ही नहीं कर सकता। रात में साला किसीने कह दिया, फिर हम कार लेकर इण्डिया गेट आइसक्रीम खाने पहुँच गये। करीब चार बजे लौटे, मैं तो कमरे की फर्श पर ही लेट गया। फिर जब ठण्ड लगी तो बिस्तर में गया।

सवेरे 9:30 बजे हमें अरोड़ा के घर पहुंचना था, पर हम ऊठे ही 10:00 बजे। फिर सब तैयार हुये, रात के खाने का और बाथरूम के गेट की कांच के पैसे भरे, और करीब 12:00 बजे शादी के लिए रवाना हुए। हृदेश, जिसे  हम प्यार, नहीं खौफ से बाहुबली बुलाते हैं, ने शानदार प्लानिंग कर 2:00 बजे की रीटर्न ट्रेन करा रखी थी। तो जैसे ही हम शादी में पहुंचे बाहुबली वापस भी निकल लिए। शादी काफ़ी इवेंटफुल रही, हमने जुते चुराने नहीं दिये, क्योंकि वो हम खुद ही चुरा कर बैठ गये थे। खाना भी मज़ेदार था और हमने पेल कर खाया।

करीब चार बजे हम भी वापस लौट गये। धीरे धीरे सब अपने घर निकल गये। मेरी भी रात 10:30 बजे की फ्लाइट थी। बोर्डिंग करने के बाद, बस अब प्लेन रनवे पर जा ही रही थी कि फिर एक का व्हाट्सएप्प ग्रुप पर मैसेज आया – “शादी फिक्स हो गयी भाई मेरी”। मैंने सोचा, चलो एक और निपट गया।

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One response to “एक और निपट गया

  1. हा हा. अच्छी रचना. मेरे जैसे तो पूरी पढ़ जायें, पर थोड़ी लंबी है उनके लिये जो ब्लॉगर नहीं. Good satirical flow!

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